रिश्ता आगे बढ़ाने से पहले लगभग हर परिवार कुंडली मिलान करवाता है। इसका सबसे प्रचलित तरीक़ा अष्टकूट गुण मिलान है, जो दोनों कुंडलियों में चंद्रमा की स्थिति की तुलना करके 36 में से अंक देता है। यह अंक किन बातों से बनता है, यह जान लेने पर परिवार उसे शांत मन से समझ पाता है।
अंक कहाँ से आते हैं
जन्म के समय चंद्रमा बारह राशियों में से एक और सत्ताईस नक्षत्रों में से एक में होता है। गुण मिलान वर और वधू की राशि और नक्षत्र की तुलना आठ अलग-अलग बातों पर करता है, जिन्हें कूट कहते हैं। हर कूट का भार अलग होता है।
आठ कूट
- वर्ण (1 गुण): काम और कर्तव्य के प्रति दृष्टिकोण।
- वश्य (2 गुण): आपसी प्रभाव और आकर्षण।
- तारा (3 गुण): स्वास्थ्य और सौभाग्य।
- योनि (4 गुण): शारीरिक और भावनात्मक स्वभाव।
- ग्रह मैत्री (5 गुण): दोनों राशि स्वामियों की मित्रता, जो विचार और साथ को दर्शाती है।
- गण (6 गुण): स्वभाव।
- भकूट (7 गुण): पारिवारिक जीवन और समृद्धि।
- नाड़ी (8 गुण): स्वास्थ्य और संतान।
इन सबका जोड़ 36 होता है।
परिवार कुल अंक को कैसे समझते हैं
परंपरा से 36 में से 18 गुण न्यूनतम माने जाते हैं। 24 से ऊपर अच्छा और 32 से ऊपर उत्तम माना जाता है। कम अंक का अर्थ अपने आप में यह नहीं कि रिश्ता अनुचित है, और अधिक अंक कोई गारंटी नहीं है।
अंकों में क्या शामिल नहीं है
गुण मिलान केवल चंद्रमा को देखता है। इसमें मांगलिक दोष नहीं देखा जाता, जो पूरी कुंडली में मंगल की स्थिति पर निर्भर है, और न ही अन्य ग्रहों का बल। नाड़ी और भकूट दोष के शास्त्रों में अपवाद भी बताए गए हैं, जिन्हें परिहार कहते हैं; वे पूरी कुंडली देखकर ही लगाए जा सकते हैं।
इसे मार्गदर्शन मानें
समझदारी यही है कि गुण मिलान को कई बातों में से एक माना जाए। अंक देखें, कोई दोष हो तो नोट करें, और फिर दोनों कुंडलियाँ अपने कुल पंडित को दिखाएँ। गोत्र की जाँच अलग से होती है; देखें गोत्र और ननिहाल गोत्र। और बड़ों की वह बात याद रखें: कुंडली एक बार मिलती है, पर दोनों परिवारों को हर दिन मिलना होता है।
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