पहली मुलाक़ात न तो इंटरव्यू है और न कोई रस्म। यह दो परिवारों की विनम्र कोशिश है यह जानने की कि क्या वे जीवन भर एक-दूसरे के साथ सहज रह पाएँगे। थोड़ी-सी तैयारी इसे सबके लिए आसान बना देती है। अगर अब तक बात केवल ऑनलाइन हुई है, तो ऑनलाइन रिश्ता खोजते समय सुरक्षित कैसे रहें भी पढ़ें।
मुलाक़ात से पहले
- पहले फ़ोन पर बात करें। माता-पिता के बीच एक छोटी, आत्मीय बातचीत से अधिकांश झिझक दूर हो जाती है।
- जगह सादी रखें। घर पर मिलना परंपरा है; पहली बातचीत के लिए कोई शांत कैफ़े या मंदिर का प्रांगण भी ठीक है।
- लोग कम रखें। पहली बार माता-पिता और वर या वधू ही काफ़ी हैं। बाक़ी परिवार बाद में आ सकता है।
- ज़रूरी बातें पहले ही बता दें। स्वास्थ्य से जुड़ी बात, पहले का विवाह, विदेश में बसने की योजना: ऐसी बातें मेज़ पर अचानक नहीं आनी चाहिए।
मुलाक़ात के दौरान
- बातचीत को साधारण रहने दें। काम, शहर, खान-पान और परिवार की बातें करें। लोग छोटी-छोटी बातों में ही अपना स्वभाव दिखाते हैं।
- लड़के और लड़की को अकेले में बात करने का समय दें, चाहे बीस मिनट ही सही। फ़ैसला उन्हीं के जीवन का हो रहा है।
- सवाल पूछें, पर जिरह न करें। और सामने वाले परिवार के सवालों का उत्तर उतने ही खुले मन से दें जितना आप अपने सवालों का चाहते हैं।
- लेन-देन की बात न छेड़ें। जो परिवार माँगों से शुरुआत करता है, वह अपने बारे में कुछ बता रहा होता है।
वर और वधू के लिए
जैसे हैं वैसे ही रहें, और वही पूछें जो आपके लिए सचमुच मायने रखता है: कहाँ रहेंगे, विवाह के बाद काम को कौन कैसे देखता है, समय कैसे बिताना पसंद है, घर में फ़ैसले कैसे होते हैं। यह कहना बिल्कुल ठीक है कि निर्णय से पहले आप एक बार और बात करना चाहेंगे।
मुलाक़ात के बाद
कुछ दिन का समय लें। फिर उत्तर ज़रूर दें, चाहे जो भी हो। साफ़ और विनम्र शब्दों में "हमें लगता है यह मेल शायद ठीक नहीं बैठेगा" कह देना चुप रह जाने से कहीं अच्छा है, और हमारे जैसे क़रीबी समाज में शिष्टता याद रखी जाती है।
अगर दोनों ओर से उत्तर हाँ हो, तो बड़ों को साथ लें, परंपरा हो तो कुंडली मिलवाएँ, और बात को उस गति से आगे बढ़ने दें जिसमें दोनों परिवार सहज हों।
